Dosti Shayari
Yaari aur dosti par likhi shayari — dost ke liye ek line.
दोस्ती, यारी और साथ बिताए मोमेंट पर लिखी शायरी।
22 entries in this collection
दोस्ती में मेरी जगह अलग है
दोस्ती में मेरी जगह अलग है,
मैं नौकरीपेशा दोस्त नहीं हूँ।
मैं तो वो दोस्त हूँ जो मुसीबत में
सबके बीच खड़ा हो जाता है।
मैं नौकरीपेशा दोस्त नहीं हूँ।
मैं तो वो दोस्त हूँ जो मुसीबत में
सबके बीच खड़ा हो जाता है।
गद्दे की कुर्सी रेशमी नहीं होती
गद्दे की कुर्सी रेशमी नहीं होती,
और दोस्ती महँगी नहीं, बस वक़्त लेती है।
और दोस्ती महँगी नहीं, बस वक़्त लेती है।
दोस्त बुरा होता तो तीर मारता
दोस्त बुरा होता तो तीर मारता,
सीधा सीने में, वरना क्या दोस्ती है।
मैंने ज़िंदगी भर पीठ पे वार सहने,
तू भी सीधा सीना मत कर, काम का है।
सीधा सीने में, वरना क्या दोस्ती है।
मैंने ज़िंदगी भर पीठ पे वार सहने,
तू भी सीधा सीना मत कर, काम का है।
तूने मेरी ग़लतें ढक दीं
तूने मेरी ग़लतें ढक दीं, बिना पूछे,
और बाद में डाँट भी दी, ये तेरी आदत थी।
लोग कहते हैं, दोस्त सच्चा वो है जो छोड़े,
पर जो चुप रहे, उसी से काम बनता है।
मैं एक बात सीखा हूँ इन दिनों,
कि दोस्ती में कोई छूट की जगह नहीं होती,
बस इज़्ज़त ज़रूरी है, बाक़ी सब माफ़।
और बाद में डाँट भी दी, ये तेरी आदत थी।
लोग कहते हैं, दोस्त सच्चा वो है जो छोड़े,
पर जो चुप रहे, उसी से काम बनता है।
मैं एक बात सीखा हूँ इन दिनों,
कि दोस्ती में कोई छूट की जगह नहीं होती,
बस इज़्ज़त ज़रूरी है, बाक़ी सब माफ़।
चुप्पी रहते हैं यार, पसंद है मुझे
चुप्पी रहते हैं यार, पसंद है मुझे,
बातें कम, हमदद बढ़ती है।
शाम को छत पर बैठना, चाय का कप,
और बीच में बस चुप्पी, यही अपनापन है।
बातें कम, हमदद बढ़ती है।
शाम को छत पर बैठना, चाय का कप,
और बीच में बस चुप्पी, यही अपनापन है।
रात को तेरी याद सबको बताऊँगा
रात को तेरी याद सबको बताऊँगा,
और वो लोग कहेंगे, सपना था।
मैं कहूँगा, सपना नहीं, अब ये सच में हो गया,
और सच में होने में वक़्त लगता है यार।
और वो लोग कहेंगे, सपना था।
मैं कहूँगा, सपना नहीं, अब ये सच में हो गया,
और सच में होने में वक़्त लगता है यार।
दोस्ती में हिसाब नहीं रखना
दोस्ती में हिसाब नहीं रखा करते,
यही एक मिथक है, जिसे हमने चालू रखा है।
मैंने जो दिया, वो डाल के क्या हुआ,
लेकिन जो दिया, उसका क़र्ज़ अब भी बाक़ी है।
और सच यह है कि दोस्ती में ख़र्च होती है,
पर लिखा कहीं नहीं जाता, यही नेकनामी है।
और सबूत सिर्फ़ वो रात रहती है, जब दोनों थके होते।
यही एक मिथक है, जिसे हमने चालू रखा है।
मैंने जो दिया, वो डाल के क्या हुआ,
लेकिन जो दिया, उसका क़र्ज़ अब भी बाक़ी है।
और सच यह है कि दोस्ती में ख़र्च होती है,
पर लिखा कहीं नहीं जाता, यही नेकनामी है।
और सबूत सिर्फ़ वो रात रहती है, जब दोनों थके होते।