दोस्ती में हिसाब नहीं रखना
दोस्ती में हिसाब नहीं रखा करते,
यही एक मिथक है, जिसे हमने चालू रखा है।
मैंने जो दिया, वो डाल के क्या हुआ,
लेकिन जो दिया, उसका क़र्ज़ अब भी बाक़ी है।
और सच यह है कि दोस्ती में ख़र्च होती है,
पर लिखा कहीं नहीं जाता, यही नेकनामी है।
और सबूत सिर्फ़ वो रात रहती है, जब दोनों थके होते।
यही एक मिथक है, जिसे हमने चालू रखा है।
मैंने जो दिया, वो डाल के क्या हुआ,
लेकिन जो दिया, उसका क़र्ज़ अब भी बाक़ी है।
और सच यह है कि दोस्ती में ख़र्च होती है,
पर लिखा कहीं नहीं जाता, यही नेकनामी है।
और सबूत सिर्फ़ वो रात रहती है, जब दोनों थके होते।
दोस्ती के हिसाब पर एक टिप्पणी, और उसे साबित करने वाली एक थकी हुई रात।