माँ के साथ बैठे बचते हैं
माँ के साथ बैठे बचते हैं,
और ख़ुद गढ़ने की ताक़त देती है।
हर मुश्किल में वो चुप रहती है,
पर कभी चुप नहीं होती।
मैं बड़ा हुआ, पर अब भी जब थकता हूँ,
तो सोचता हूँ, माँ की गोद आ जाए, कितना अच्छा होगा।
वो जगह आज भी है, बस उम्र बदल गई है।
और ख़ुद गढ़ने की ताक़त देती है।
हर मुश्किल में वो चुप रहती है,
पर कभी चुप नहीं होती।
मैं बड़ा हुआ, पर अब भी जब थकता हूँ,
तो सोचता हूँ, माँ की गोद आ जाए, कितना अच्छा होगा।
वो जगह आज भी है, बस उम्र बदल गई है।
माँ के पास बैठने से मिलने वाली ताक़त, और बड़े होकर भी उस जगह की याद।