साथ चलते थे, आज अलग राहें हैं
और बीच में जो फ़ासला है, वो रास्ता नहीं है।
Bewafa ka dard — jab wada poora na hua ho.
बेवफ़ा शायरी का सबसे कड़वा हिस्सा है, और इसीलिए इसकी सबसे ज़्यादा माँग भी है। इन पंक्तियों में वह इंसान ढूँढा जाता है जो वादा करके चला गया, या जिसने दोस्ती के नाम पर सिर्फ़ अपना स्वार्थ देखा।
यह पृष्ठ उन लोगों के लिए है जिन्होंने वक़्त नहीं, पैसा नहीं, बस दिल दिया था। और वापसी में उन्हें वह सब मिला जिसकी उन्हें कभी उम्मीद नहीं थी। पढ़ते हुए लगेगा कि ये बातें लिखी नहीं, बस निकल पड़ी हैं।
यहाँ ध्यान रखने की बात यह है कि बेवफ़ा पंक्तियाँ नफ़रत पैदा करने के लिए नहीं होतीं। इनका मक़सद सिर्फ़ इतना है कि आप अपनी सच्ची बात किसी को सुना सकें, बिना किसी की मद करे।
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इन पंक्तियों को पढ़ते समय अपने आप को थोड़ा नियंत्रण में रखिए। कई बार ये शब्द वह चीख़ निकलना चाहते हैं जो स्क्रीन पर लिखना उचित नहीं।
हर बेवफ़ा शायरी की पीछे एक ठोस हक़ीक़त होती है।
सबसे बड़ी ग़लती ग़ुस्से को शब्द देना है, क्योंकि वह क्षण भर में नहीं लिखा जाता।
नफ़रत वहाँ होती है जहाँ अभी भी उम्मीद बची हो। जब उम्मीद पूरी तरह ख़त्म हो जाए, तो सिर्फ़ एक ठंडा दर्द रह जाता है, और वही शायरी में सबसे ज़्यादा लिखा भी जाता है।
जो बार-बार बदलता है उसके लिए इंतज़ार मत करिए, आगे बढ़िए।
जब शायरी से थोड़ा हल्कापन चाहिए, तो हल्के-फुल्के ज़रूरत वाले पृष्ठ को देखिए। और जो बात बिना शब्दों के समझ आ जाए, वैसी पंक्तियाँ नाज़ुक दिल वाली शायरी में मिलती हैं।