चुप्पी रहने में ही टूट जाता हूँ
चुप रहने में ही टूट जाता हूँ,
यह बात मैंने किसी को नहीं कही।
लोग कहते हैं, बोलो, आज़ाद रहोगे,
मैं बोलता हूँ और फिर चुप हो जाता हूँ।
कभी सोचता हूँ, यह कमज़ोरी है,
और कभी सोचता हूँ, यही इंसानियत है।
बीच में मैं हूँ, और कोई फ़ैसला नहीं।
चुप रहकर टूटने की आदत और उस पर लोगों के सलाह और आपस का असमंजस्य।