जिस दर्द को कहना नहीं जाता
जिस दर्द को कहना नहीं जाता, वो सबसे भारी होता है,
क्योंकि उसे सहलाने वाला कोई नहीं होता।
मैं रात को छत पर जाता हूँ, हवा से बात करता हूँ,
पर हवा भी जल्दी हट जाती है, ये भी सच है।
कभी-कभी सोचता हूँ, बोल दूँ किसी से,
मगर सुनने वाला कोढ़ा और देता है।
तो यही दर्द है, किसी को कहना नहीं जाता।
क्योंकि उसे सहलाने वाला कोई नहीं होता।
मैं रात को छत पर जाता हूँ, हवा से बात करता हूँ,
पर हवा भी जल्दी हट जाती है, ये भी सच है।
कभी-कभी सोचता हूँ, बोल दूँ किसी से,
मगर सुनने वाला कोढ़ा और देता है।
तो यही दर्द है, किसी को कहना नहीं जाता।
बिना कहे रहने वाला एक दुख, छत पर हवा से मोलतोल और चुप रहने की कीमत।