मैगी देर से बनती है, तू देर से आती है,
मैं रोज़ बर्तन जोड़ता हूँ, ख़ुद को समझाता हूँ।
तूने कहा था, ख़ुदा देखेगा इंतज़ार का,
मैंने गिने साल, हर साल वही सी चौहान्दी।
आज भी मेज़ पर दो कटोरी हैं, एक ही रस्सी से बंधी,
एक कटोरी सूखी रहती है, फिर भी मैं धोता हूँ।
लोग कहते हैं, ज़िंदगी में हर चीज़ मिलती है,
मैं कहता हूँ, कुछ चीज़ें बस टाइम पर नहीं मिलतीं।
जिस दर्द को कहना नहीं जाता, वो सबसे भारी होता है,
क्योंकि उसे सहलाने वाला कोई नहीं होता।
मैं रात को छत पर जाता हूँ, हवा से बात करता हूँ,
पर हवा भी जल्दी हट जाती है, ये भी सच है।
कभी-कभी सोचता हूँ, बोल दूँ किसी से,
मगर सुनने वाला कोढ़ा और देता है।
तो यही दर्द है, किसी को कहना नहीं जाता।