कि कुछ कहना बचा नहीं
जो दिल में है, वो मैं कहता हूँ क्या,
जो कहता हूँ, वो दिल में रहता नहीं।
और जो रहता है, उसे कोई सुनता नहीं,
और जो सुनता है, वो मुस्कुरा देता है।
कहने और सुनने के बीच फँसी एक चार पंक्तियों की दिक्क़त पर विचार।
जो दिल में है, वो मैं कहता हूँ क्या,
जो कहता हूँ, वो दिल में रहता नहीं।
और जो रहता है, उसे कोई सुनता नहीं,
और जो सुनता है, वो मुस्कुरा देता है।
कहने और सुनने के बीच फँसी एक चार पंक्तियों की दिक्क़त पर विचार।