रात की याद का शीशा
रात की याद का शीशा फूट गया,
अब चेहरा नहीं, सिर्फ़ टूटने की आवाज़।
अब चेहरा नहीं, सिर्फ़ टूटने की आवाज़।
याद के शीशे के टूटने की रात, और जो बचा वह चेहरा नहीं सिर्फ़ आवाज़ है।
याद के शीशे के टूटने की रात, और जो बचा वह चेहरा नहीं सिर्फ़ आवाज़ है।